कृष्ण का मतलब जो सबसे अधिक आकर्षक हे -वह शक्ति जो सब कुछ अपनी और खीचती हे .
कृष्ण वह निराकार केंद्र हे जो सर्व व्यापी हे ,कोईभी आकर्षण कही से भी हो कृष्ण से ही है
प्रायः व्यक्ति आकर्षण के मूल सत्व को नहीं देख पाते और बाहरी आवरण में उलझे रहते है और जब तुम बाहरी आवरण को प्राप्त करने की चेष्टा करते हो,कृष्ण तुम्हे चकमा देते है और तुम्हारे हाथो में रह जता है खोखला आवरण और आखो में आंसू,
राधा की तरह चतुर बनो,कृष्ण के छल में मत आओ ,कृष्ण राधा से दूर हो ही नहीं सके क्योकि राधा की पूरी दुनिया ही कृष्णमय थी.अगर तुम हर आकर्षण में कृष्ण को देख सको ,तब तुम राधा ही हो, आप में केंद्रित हो.
मन सोंदर्य ,आनंद व् सत्य की और बढता है,कृष्ण अर्जुनसे कहते है,'मै सुंदरता में सौंदर्य हूँ ,सशक्त में शक्ति हूँ और ज्ञानी में ज्ञान हूँ'.इस प्रकार वे मन को अपने से दूर भटकने से रोकते है . श्री श्री रवीशंकर्.
कृष्ण वह निराकार केंद्र हे जो सर्व व्यापी हे ,कोईभी आकर्षण कही से भी हो कृष्ण से ही है
प्रायः व्यक्ति आकर्षण के मूल सत्व को नहीं देख पाते और बाहरी आवरण में उलझे रहते है और जब तुम बाहरी आवरण को प्राप्त करने की चेष्टा करते हो,कृष्ण तुम्हे चकमा देते है और तुम्हारे हाथो में रह जता है खोखला आवरण और आखो में आंसू,
राधा की तरह चतुर बनो,कृष्ण के छल में मत आओ ,कृष्ण राधा से दूर हो ही नहीं सके क्योकि राधा की पूरी दुनिया ही कृष्णमय थी.अगर तुम हर आकर्षण में कृष्ण को देख सको ,तब तुम राधा ही हो, आप में केंद्रित हो.
मन सोंदर्य ,आनंद व् सत्य की और बढता है,कृष्ण अर्जुनसे कहते है,'मै सुंदरता में सौंदर्य हूँ ,सशक्त में शक्ति हूँ और ज्ञानी में ज्ञान हूँ'.इस प्रकार वे मन को अपने से दूर भटकने से रोकते है . श्री श्री रवीशंकर्.